Friday, 14 April 2023

गंगाजल ख़राब क्यों नहीं होता

गंगाजल ख़राब क्यों नहीं होता
🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸
हिमालय की कोख गंगोत्री से निकली गंगा (भागीरथी), हरिद्वार (देवप्रयाग) में अलकनंदा से मिलती है। यहाँ तक आते-आते इसमें कुछ चट्टानें घुलती जाती हैं जिससे इसके जल में ऐसी क्षमता पैदा हो जाती है जो पानी को सड़ने नहीं देती। हर नदी के जल की अपनी जैविक संरचना होती है, जिसमें वह ख़ास तरह के घुले हुए पदार्थ रहते हैं जो कुछ क़िस्म के जीवाणु को पनपने देते हैं और कुछ को नहीं। वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि गंगा के पानी में ऐसे जीवाणु हैं जो सड़ाने वाले कीटाणुओं को पनपने नहीं देते, इसलिए पानी लंबे समय तक ख़राब नहीं होता।

वैज्ञानिक कारण
🔸🔸🔹🔸🔸
वैज्ञानिक बताते हैं कि हरिद्वार में गोमुख- गंगोत्री से आ रही गंगा के जल की गुणवत्ता पर इसलिए कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि यह हिमालय पर्वत पर उगी हुई अनेकों जीवनदायनी उपयोगी जड़ी-बूटियों, खनिज पदार्थों और लवणों को स्पर्श करता हुआ आता है। वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि हिमालय की कोख गंगोत्री से निकली गंगा के जल का ख़राब नहीं होने के कई वैज्ञानिक कारण भी हैं। गंगाजल में बैट्रिया फोस नामक एक बैक्टीरिया पाया गया है जो पानी के अंदर रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अवांछनीय पदार्थों को खाता रहता है। इससे जल की शुद्धता बनी रहती है।

गंगा के पानी में गंधक (सल्फर) की प्रचुर मात्रा मौजूद रहती है; इसलिए भी यह ख़राब नहीं होता। इसके अतिरिक्त कुछ भू-रासायनिक क्रियाएं भी गंगाजल में होती रहती हैं, जिससे इसमें कभी कीड़े पैदा नहीं होते। यही कारण है कि यह पानी सदा पीने योग्य माना गया है। जैसे-जैसे गंगा हरिद्वार से आगे अन्य शहरों की ओर बढ़ती जाती है शहरों, नगर निगमों और खेती-बाड़ी का कूड़ा-करकट तथा औद्योगिक रसायनों का मिश्रण गंगा में डाल दिया जाता है।

वैज्ञानिको के मत एवं शोध
🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
वैज्ञानिक परीक्षणों से पता चला है कि गंगाजल से स्नान करने तथा गंगाजल को पीने से हैजा, प्लेग, मलेरिया तथा क्षय आदि रोगों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इस बात की पुष्टि के लिए एक बार डॉ. हैकिन्स, ब्रिटिश सरकार की ओर से गंगाजल से दूर होने वाले रोगों के परीक्षण के लिए आए थे। उन्होंने गंगाजल के परिक्षण के लिए गंगाजल में हैजे (कालरा) के कीटाणु डाले गए। हैजे के कीटाणु मात्र 6 घंटें में ही मर गए और जब उन कीटाणुओं को साधारण पानी में रखा गया तो वह जीवित होकर अपने असंख्य में बढ़ गया। इस तरह देखा गया कि गंगाजल विभिन्न रोगों को दूर करने वाला जल है।

फ्रांस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. हैरेन ने गंगाजल पर वर्षों अनुसंधन करके अपने प्रयोगों का विवरण शोधपत्रों के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने आंत्र शोध व हैजे से मरे अज्ञात लोगों के शवों को गंगाजल में ऐसे स्थान पर डाल दिया, जहाँ कीटाणु तेजी से पनप सकते थे। डॉ. हैरेन को आश्चर्य हुआ कि कुछ दिनों के बाद इन शवों से आंत्र शोध व हैजे के ही नहीं बल्कि अन्य कीटाणु भी गायब हो गए। उन्होंने गंगाजल से 'बैक्टीरियासेपफेज' नामक एक घटक निकाला, जिसमें औषधीय गुण हैं।

इंग्लैंड के जाने-माने चिकित्सक सी. ई. नेल्सन ने गंगाजल पर अन्वेषण करते हुए लिखा कि इस जल में सड़ने वाले जीवाणु ही नहीं होते। उन्होंने महर्षि चरक को उद्धृत करते हुए लिखा कि गंगाजल सही मायने में पथ्य है।

रूसी वैज्ञानिकों ने हरिद्वार एवं काशी में स्नान के उपरांत 1950 में कहा था कि उन्हें स्नान के उपरांत ही ज्ञात हो पाया कि भारतीय गंगा को इतना पवित्र क्यों मानते हैं।

गंगाजल की पाचकता के बारे में ओरियंटल इंस्टीटयूट में हस्तलिखित आलेख रखे हैं। कनाडा के मैकिलन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. एम. सी. हैमिल्टन ने गंगा की शक्ति को स्वीकारते हुए कहा कि वे नहीं जानते कि इस जल में अपूर्व गुण कहाँ से और कैसे आए। सही तो यह है कि चमत्कृत हैमिल्टन वस्तुत: समझ ही नहीं पाए कि गंगाजल की औषधीय गुणवत्ता को किस तरह प्रकट किया जाए।

आयुर्वेदाचार्य गणनाथ सेन, विदेशी यात्री इब्नबतूता वरनियर, अंग्रेज़ सेना के कैप्टन मूर, विज्ञानवेत्ता डॉ. रिचर्डसन आदि सभी ने गंगा पर शोध करके यही निष्कर्ष दिया कि यह नदी अपूर्व है।

गंगाजल में स्नान
🔸🔸🔹🔸🔸
गंगा नदी में तैरकर स्नान करने वालों को स्नान का विशेष लाभ होता है। गंगाजल अपने खनिज गुणों के कारण इतना अधिक गुणकारी होता है कि इससे अनेक प्रकार के रोग दूर होते हैं। गंगा नदी में स्नान करने वाले लोग स्वस्थ और रोग मुक्त बने रहते हैं। इससे शरीर शुद्ध और स्फूर्तिवान बनता है। भारतीय सभ्यता में गंगा को सबसे पवित्र नदी माना जाता है। गंगा नदी के पानी में विशेष गुण के कारण ही गंगा नदी में स्नान करने भारत के विभिन्न क्षेत्र से ही नहीं बल्कि संसार के अन्य देशों से भी लोग आते हैं। गंगा नदी में स्नान के लिए आने वाले सभी लोग विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति पाने के लिए हरिद्वार और ऋषिकेश आकर मात्र कुछ ही दिनों में केवल गंगा स्नान से पूर्ण स्वस्थ हो जाते हैं। कई विद्वानों ने गंगाजल की पवित्रता का वर्णन अपने निबन्धों में पूर्ण आत्मा से किया है। भौतिक विज्ञान के कई आचार्यो ने भी गंगाजल की अद्भुत शक्ति और प्रभाव को स्वीकार किया है।
🔸🔸🔹

Thursday, 23 February 2023

* नैमिषारण्य *तीरथ वर नैमिष विख्याता ।अति पुनीत साधक सिधि दाता ।।

* नैमिषारण्य *
तीरथ वर नैमिष विख्याता ।
अति पुनीत साधक सिधि दाता ।।
"वाल्मीकि-रामायण में 'नैमिष' नाम से उल्लिखित इस स्थान के बारे में कहा गया है कि श्री राम ने गोमती नदी के तट पर अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किया था- 'ऋषियों के साथ लक्ष्मण को घोड़े की रक्षा के लिये नियुक्त करके रामचन्द्र जी सेना के साथ नैमिषारण्य के लिए प्रस्थित हुए।' महाभारत के अनुसार युधिष्ठिर और अर्जुन ने इस तीर्थ-स्थल की यात्रा की थी। 'आइने अकबरी' में भी इस स्थल का वर्णन मिलता है। हिन्दी साहित्य के गौरव महाकवि नरोत्तमदास की जन्म-स्थली (बाड़ी) भी नैमिषारण्य के समीप ही स्थित है।"
जिस प्रकार मानव-शरीर में मस्तिष्क अपने गुणों के कारण विशिष्ट महत्व रखता है, उसी प्रकार पृथ्वी पर अवस्थित कुछ विशेष स्थान अपनी विशिष्टता के कारण पवित्र माने जाते हैं कि ये स्थान जनमानस में 'तीर्थ' या 'पावन धाम' के रूप में समादृत हैं। पवित्र नदियों के तट पर स्थित ये तीर्थ कभी ऋषि-मुनियों की तपस्या और आराधना के केन्द्र हुआ करते थे क्योंकि वनों की हरीतिमा और शुद्ध वातावरण आध्यात्मिक अन्वेषकों के लिये अनुकूल होता था। इसके साथ ही सुख-शान्ति-प्रदायक ये तीर्थ केन्द्र श्रद्धालुजनों को भी आकर्षित करते थे।

आधुनिक सभ्यता के विकास के साथ ये तीर्थस्थल आध्यात्मिकता के साथ-साथ व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़ गए लेकिन उनकी मूल आस्था निरन्तर बनी रही है।

ऐसा ही एक तीर्थस्थल उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में नैमिषारण्य है, जिसकी महिमा पुराणों में वर्णित है। कहा जाता है कि शौनक ऋषि ज्ञान की पिपासा शान्त करने के लिए ब्रहमा जी के पास गए। ब्रहमा जी ने उन्हें एक चक्र दिया और कहा कि इसे चलाते हुए चले जाओ। जहाँ चक्र की नेमि (बाहरी परिधि) गिरे, उसे पवित्र स्थान समझकर- वहाँ आश्रम स्थापित कर लोगों को ज्ञानार्जन कराओ। शौनक ऋषि के साथ कई अन्य ऋषिजन इसी प्रयोजन से चले।

अन्तत: गोमती नदी के तट पर चक्र की नेमि गिरी और भूमि में प्रवेश कर गयी। तभी से यह स्थल चक्रतीर्थ तथा नैमिषारण्य के नाम से विख्यात हुआ। जनश्रुति के अनुसार नैमिषारण्य का नाम 'निमिषा' का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता नेत्र की आभा। वैदिक काल में यह तपस्थली एक प्रमुख शिक्षा-केन्द्र के रूप में विख्यात थी। पौराणिक मान्यतानुसार नैमिषारण्य 88000 ऋषि-मुनियों के तप-ज्ञानार्जन का केन्द्र था।

कहा जाता है कि शौनक आदि ऋषियों को सूत जी ने अट्ठारह पुराणों की कथा और मर्म का यही उपदेश दिया था। द्वापर में श्री कृष्ण के भाई बलराम भी यहाँ आए थे और यज्ञ किया था। प्राचीनकाल में इस सुरम्य स्थल का वृहद् भू-भाग वनाच्छादित था। शान्त और मनोरम वातावरण के कारण यह अध्ययन, मनन और ज्ञानार्जन हेतु एक आदर्श स्थान है।

यज्ञवाटश्व सुमहान् गोमत्या नैमिषे वने ।
आज्ञाप्यतां महाबाहो तद्धि पुण्यमनुत्तमम् ।।

-वाल्मीकि- रामायण

प्राचीन और घर-घर में प्रचलित श्री सत्यनारायण भगवान् की कथा का प्रवर्तन नैमिषारण्य की पावन धरा से ही हुआ, जिसका प्रारम्भ नैमिषारण्य के उल्लेख के साथ होता है-

एकदा नैमिषारण्ये ऋषय: शौनकादय: ।
प्रपच्छुर्मुनय: सर्वे सूतं पौराणिकं खलु ।।

एक बार भगवान् विष्णु एवं देवताओं के परम पुण्यमय क्षेत्र नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों ने भगवत्-प्राप्ति की इच्छा से सहस्र वर्षो में पूरे होने वाले एक महान् यज्ञ क अनुष्ठान किया।

-श्रीमद्भागवत महापुरण - प्रथम स्कन्ध

नैमिषारण्य का उल्लेख कूर्म पुराण में मिलता है, जिसमें इसे तीनों लोकों में प्रसिद्ध बताया गया है -

इदं त्रैलोक्य विख्यातं, तीर्थ नैमिषमुत्तमम् ।
महादेव प्रियकरं, महापातकनाशनम् ।।

जहाँ श्रीदेवीभागवत में नैमिषारण्य स्थित चक्रतीर्थ एवं पुष्कर को सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कहा गया है, वहीं आस्थावानजन ऐसा विश्वास करते है कि बदरीनाथ व केदारनाथ धाम की यात्रा नैमिषारण्य की यात्रा के उपरान्त ही पूर्ण होती है।

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने नैमिषारण्य का माहात्म्य-निदर्शन करते हुए तभी तो कहा है-

तीरथ वर नैमिष विख्याता ।
अति पुनीत साधक सिधि दाता ।।

ऐसे विशिष्ट माहात्म्य के कारण ही नैमिषारण्य को महिमामण्डित तीर्थ-स्थल के रूप में सर्वत्र मान्यता प्राप्त है। इसी कारण यहाँ प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालुजन दर्शनार्थ आते है। चक्रतीर्थ, भूतेश्वरनाथ मन्दिर, व्यासगद्दी, हवनकुण्ड, ललितादेवी का मन्दिर, पंचप्रयाग, शेष मन्दिर, क्षेमकाया मन्दिर, हनुमानगढ़ी, शिवाला-भैरव जी मन्दिर, पंच पाण्डव मन्दिर, पुराण मन्दिर माँ आनन्दमयी आश्रम, नारदानन्द सरस्वती आश्रम-देवपुरी मन्दिर, रामानुज कोट, अहोबिल मठ, परमहंस गौड़ीय मठ आदि के साथ ही लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मिश्रिख व दधीचिकुण्ड तथा 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हत्याहरण तीर्थ नैमिषारण्य के प्रमुख आकर्षण हैं।